
न्यूज़ खबर इंडिया संवाददाता
वाराणसी। 12 मार्च 1930 भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास का वह दिन है, जब महात्मा गांधी ने अन्यायपूर्ण ब्रिटिश नमक कानून को चुनौती देने के लिए ऐतिहासिक दांडी मार्च की शुरुआत की। यह केवल एक यात्रा नहीं थी, बल्कि अहिंसक प्रतिरोध की वह क्रांति थी जिसने पूरे विश्व का ध्यान भारत की स्वतंत्रता की लड़ाई की ओर खींच लिया।
महात्मा गांधी अपने जीवन में एक अनथक यात्री रहे। वे प्रतिदिन लगभग 24 किलोमीटर पैदल चलते थे। कहा जाता है कि उन्होंने अपने जीवनकाल में जितनी पदयात्राएँ कीं, उनके कदमों की दूरी धरती के दो बार चक्कर लगाने के बराबर मानी जा सकती है। शायद यही कारण है कि उन्हें “सफर का सूफी” भी कहा जाता है। प्रसिद्ध लेखक लुई फिशर ने गांधीजी के बारे में लिखा था कि यदि पूरे इतिहास में नहीं तो कम से कम 20वीं सदी में वे दुनिया के सबसे बड़े व्यक्ति थे।
दरअसल 1929 में कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन में पूर्ण स्वराज्य का प्रस्ताव पारित हुआ था। इसके बाद ब्रिटिश शासन और गांधीजी के बीच सीधा टकराव तेज हो गया। गांधीजी कई दिनों तक चिंतन करते रहे और अंततः उन्होंने अंग्रेजों के अन्यायपूर्ण नमक कानून को तोड़ने का निर्णय लिया। यह निर्णय केवल राजनीतिक नहीं बल्कि नैतिक और प्रतीकात्मक भी था, क्योंकि नमक हर भारतीय की दैनिक जरूरत से जुड़ा हुआ था।
11 मार्च 1930 की रात साबरमती आश्रम में असाधारण माहौल था। पूरा आश्रम जाग रहा था। लोग चिंतित थे कि दांडी मार्च शुरू होते ही गांधीजी को गिरफ्तार कर लिया जाएगा। गांधीजी की सहयोगी मीरा बेन ने अपने संस्मरण में लिखा है कि उस रात जब पूरा आश्रम जाग रहा था, तब केवल एक व्यक्ति गहरी नींद में सो रहा था—महात्मा गांधी। उनका विश्वास था कि भविष्य की चिंता करने से बेहतर है सत्य और साहस के मार्ग पर चलना।
12 मार्च 1930 की सुबह लगभग साढ़े छह बजे गांधीजी अपने 78 साथियों के साथ साबरमती आश्रम से समुद्र की ओर चल पड़े। यह यात्रा लगभग 241 मील यानी 388 किलोमीटर लंबी थी, जिसे उन्होंने 24 दिनों में पूरा किया। रास्ते में हजारों लोग उनके दर्शन के लिए उमड़ पड़ते थे। गांव-गांव में लोग उनका स्वागत करते, उनके पैरों में छाले न पड़ें इसके लिए रास्ते पर घास और पत्तियां बिछा देते थे।
गांधीजी ने जानबूझकर ऐसा मार्ग चुना था जो अधिक से अधिक गांवों से होकर गुजरता था, ताकि यह यात्रा केवल एक मार्च न रहकर जनजागरण का आंदोलन बन जाए। दुनिया भर के पत्रकार इस ऐतिहासिक यात्रा को कवर करने भारत पहुंचे। धीरे-धीरे यह मार्च ब्रिटिश साम्राज्य के लिए चिंता का विषय बन गया और विश्व मीडिया की सुर्खियों में छा गया।
5 अप्रैल 1930 की शाम गांधीजी अपने साथियों के साथ गुजरात के समुद्र तटीय गांव दांडी पहुंचे। अगले दिन 6 अप्रैल की सुबह उन्होंने समुद्र तट पर जाकर नमक की एक मुट्ठी उठाई और ब्रिटिश नमक कानून को तोड़ दिया। नमक के वे सफेद कण भारत के स्वतंत्रता संग्राम का नया प्रतीक बन गए।
दांडी यात्रा के दौरान सरदार वल्लभभाई पटेल को भी निषेधाज्ञा का उल्लंघन करने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया। इसके बाद अंग्रेजों ने पूरे देश में नमक सत्याग्रहियों को गिरफ्तार करना शुरू कर दिया। स्वयं गांधीजी को भी नमक कानून तोड़ने और लोगों को आंदोलन के लिए प्रेरित करने के आरोप में गिरफ्तार कर यरवदा जेल भेज दिया गया।
लेकिन ब्रिटिश सरकार का दमन इस आंदोलन को रोक नहीं सका। दांडी मार्च ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को नई दिशा दी और गांधीजी को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक महान नेता के रूप में स्थापित कर दिया। यह आंदोलन साबित करता है कि सत्य, साहस और अहिंसा के बल पर भी सबसे बड़ी साम्राज्यवादी सत्ता को चुनौती दी जा सकती है।

आज भी दांडी मार्च केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि अन्याय के खिलाफ शांतिपूर्ण प्रतिरोध की सबसे प्रभावशाली मिसाल है। नमक की वह मुट्ठी आज भी हमें याद दिलाती है कि जब जनता अन्याय के विरुद्ध खड़ी हो जाती है, तब इतिहास की धारा बदल जाती है।
— अनंत कुमार सिंह
संपादक, न्यूज़ खबर इंडिया




